रविवार रंग-हजारपन्ना SUNDAY 26 जुलाई 2026, ¹·¤·¤·¤·¤·¤इंदौर सोनल शरामा उनहें पयाि ्ते ‘्ंगरीत ्म्ाट’ कहतते हैं। करियि करी शुरुआत के पांच दशक ्बाद भरी इलैया िािा का ्ंगरीत भाित के घिों, कॉन्ट्ट हॉल औि ज्नतेमा के पददों पि उ्री तिह गूंिता है। तकमलनाडु के...
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रविवार रंग-हजारपन्ना SUNDAY 26 जुलाई 2026, ¹·¤·¤·¤·¤·¤इंदौर सोनल शरामा उनहें पयाि ्ते ‘्ंगरीत ्म्ाट’ कहतते हैं। करियि करी शुरुआत के पांच दशक ्बाद भरी इलैया िािा का ्ंगरीत भाित के घिों, कॉन्ट्ट हॉल औि ज्नतेमा के पददों पि उ्री तिह गूंिता है। तकमलनाडु के संगीतकार इलै्ा राजा (83) अब तक नौ राषा की एक हजार से ज्ादा कफलमों में संगीत दे चुके हैं। रारती् कसनेमा में ककसी और के नाम नहीं है। ‘अन्ाककली’ (1976) के जररए उनहोंने तकमल कफलम संगीत की दुकन्ा को बदलकर रख कद्ा। इसके बाद रारत के सबसे नामी संगीतकारों में शाकमल हो गए। शासरिी् गा्क टी.एम. कृषणा कहते हैं कक इलै्ा राजा का आना रारती् कफलम संगीत में बड़ा मोड़ था। ऐसे माहौल से आए थे, जो उस सम् कफलम संगीत की आम िुनों से अलग था। अपने साथ न्ा संगीत लेकर आए। रारत में गा्क पहले गाने ररकलॉड्ड करते हैं और कफर ए्टर पददे पर अकरन् करते हैं। संगीतकार ही आमतौर पर बैकग्ाउंड संगीत देते हैं। इलै्ा राजा से पहले ज्ादातर कफलमी संगीत रारती् शासरिी् संगीत पर होता था। पकशचमी देशों के बड़े ऑककेसट्ा वाले संगीत का इसतेमाल बहुत कम होता था। इलै्ा राजा ने दुकन्ा रर की कई संगी
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