रविवार पन्ना SUNDAY 28 जून 2026, इंदौर वसनेमा में ऐसा भी एक दौर था, जब विलम का हीरो कोई और होता था, लेककन लोग ककसी और का इंतजार कर रहे होते थे। गाने हीरो पर किल्ाए जाते थे, पोस्टर पर हीरो का चेहरा च्कता था, कहानी हीरो के इर्द-कगर्द घू्ती थी, लेककन जैसे ही...
More
रविवार पन्ना SUNDAY 28 जून 2026, इंदौर वसनेमा में ऐसा भी एक दौर था, जब विलम का हीरो कोई और होता था, लेककन लोग ककसी और का इंतजार कर रहे होते थे। गाने हीरो पर किल्ाए जाते थे, पोस्टर पर हीरो का चेहरा च्कता था, कहानी हीरो के इर्द-कगर्द घू्ती थी, लेककन जैसे ही ्ह्ूर परदे पर आते थे, पूरा ्ाहौल बरल जाता था। कुससी पर सीधे बैठ जाते थे, हॉल ्ें हरकत आ जाती थी और किल् जैसे अचानक कजंरा हो उठती थी। ्ह्ूर कसि्फ कॉ्ेकियन नहीं थे। ऐसे कलाकार थे, जो सीन ्ें आते नहीं थे, सीन अपने ना् कर लेते थे। यही वजह थी कक कई हीरो उनके साथ का् करने से िरते थे। िर यह था कक ्ह्ूर इतना अच्ा कर रेंगे कक अपनी ्ेहनत पी्े ्ू्ट जाएगी। किल् खत् होगी, लोग कहानी भूल जाएंगे, लेककन ्ह्ूर का चेहरा, आवाज और अंराज यार रह जाएगा। उनका क्ेज ऐसा था कक ्ह्ूर का ना् रेखकर क्टक्ट खरीर लेते थे। कन्ा्दता जानते थे कक किल् ्ें ्ह्ूर हैं तो खाली हाथ नहीं लौ्टेंगे। कजतेंद्र जैसे कलाकार यह स्झते थे कक ्ह्ूर होंगे तो किल् चलेगी और किल् चलेगी तो सब चलेंगे। कजतेंद्र को अकभनय के बारे ्ें कोई ्ुगालता नहीं था। जब एस.एस. रवैल को Ò"रीरार-ए-यार' री थी, तभ
Less